एक छोटे से बच्चे ने बनाया था खेल जगत का अनोखा इतिहास. चार साल की उम्र में मैराथन दौड़कर उन्होंने सबको दंग कर दिया था. वो भी महज़ सात घंटों में. ये बात है वर्ष 2006 की जब इस बच्चे ने रातों-रात सुर्खियां बटोर ली थीं. मगर, फिर आया गुमनामी का एक लंबा दौर जिससे वो आज भी उबरने की कोशिश कर रहा है.
15 के हो गए हैं बुधिया
मिलिए, ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के रहने वाले धावक बुधिया सिंह से. बुधिया सिंह अब 15 साल के हो गए हैं. 2006 के बाद से बुधिया ने किसी भी बड़ी प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लिया है. ये उनके कोच बिरंचि दास की अचानक हुई हत्या के बाद हुआ. हालांकि ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करने का सपना लेकर वो रात-दिन अभ्यास में लगे हुए हैं. बुधिया से मेरी मुलाक़ात भुवनेश्वर की सलिया साई बस्ती में हुई. यानी उसी झोपड़पट्टी में जहां से निकालकर उनके कोच बिरंचि दास ने उन्हें तराशा था और कामयाबी के फ़लक तक पहुंचा दिया था.
ओलंपिक में गोल्ड जीतने की तमन्ना
बुधिया और उनके परिवार के लोग किसी से मिलना नहीं चाहते. मीडिया से भी, क्योंकि कुछ दिनों पहले जिस तरह के बुधिया को लेकर ख़बरें बनाईं गईं, उससे वो आहत हैं. बड़ी मुश्किल से हमने बुधिया को ढूंढ निकाला. बातों बातों में उन्होंने बचपन के सपने के बारे में बताया और कहा, "बचपन से आज तक एक ही सपना है, ओलंपिक में खेलना है और देश के लिए 'गोल्ड मेडल' जीतना..." इस परिवार ने बहुत सारे उतार-चढ़ाव देखे हैं और आज भी वो आर्थिक तंगी के दौर से ही गुज़र रहे हैं.
किसी तरह गुजर-बसर
बुधिया की मां सुकांती सिंह की कमाई से ही घर का खर्च चलता है. बुधिया की तीन बहनें भी हैं जो उनसे बड़ी हैं और पढ़ रही हैं. मगर कम तनख़्वाह में सुकांती सिंह किसी तरह गुज़ारा कर रही हैं. परिवार के सदस्यों के बीच बैठी सुकांती सिंह पिछले दिनों को याद करती हैं जब उनके पति ज़िंदा थे.
किसी ने भी मदद नहीं की
वो कहती हैं, "मैं जहाँ काम करती हूँ, वहां मेरी तनख़्वाह सिर्फ़ 8000 रुपये है. इसी तनख़्वाह से सब दुःख सुख चल रहा है. इसी पैसे से मकान का किराया देते हैं. इसी पैसे से खाते हैं. गाड़ी का भाड़ा देते हैं. किसी तरह गुज़र बसर कर रहे हैं. सब लोगों ने आश्वासन दिया था कि हम बुधिया के लिए ये कर देंगे, वो कर देंगे. मगर किसी ने भी कोई मदद नहीं की. सिर्फ़ कहने-कहने की बातें थीं."
सरकारी उदासीनता का शिकार हुए बुधिया फिर से ख़ुद को बटोरने में जुट गए हैं. उन्हें मलाल है कि वायदों के बावजूद राज्य सरकार के खेल विभाग ने उनका साथ नहीं दिया. कोई संगठन भी उनकी मदद करने आगे नहीं आया.
बुधिया के नए कोच
बुधिया कहते हैं, "मैं भुवनेश्वर के खेल हॉस्टल में दस साल तक था. उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम्हें बाहर लेकर जाएंगे. प्रतियोगिताओं में शामिल करवायेंगे. लेकिन कुछ भी नहीं हुआ. मुझे उम्मीद थी सरकार मेरी मदद करेगी. उन्होंने कुछ नहीं किया. जब मैं यहां डीएवी स्कूल में आया तो आनंद चंद्र दास सर मुझे ट्रेनिंग दे रहे हैं. प्रतियोगिताओं के लिए तैयार कर रहे हैं. मुझे नई तकनीक सीखा रहे हैं."
कामयाबी की ऊंचाइयों तक पहुंचाने वाले पहले कोच बिरंचि दास की हत्या हुई तो कई सालों तक बुधिया बिना कोच के ही रहे. इसी वजह से उनकी ट्रेनिंग रुक गयी और प्रतियोगिताओं में वो हिस्सा भी नहीं ले पाए.
डीएवी स्कूल में आने से आया बदलाव
अपने स्तर से ही वो फिर से दौड़ने की कोशिश करते रहे. मगर नयी तकनीकों से अनभिज्ञ, बुधिया को उतनी कामयाबी नहीं मिल पायी जिसकी वो उम्मीद कर रहे थे. मगर ज़िंदगी ने एक बार फिर करवट लेनी शुरू कर दी जब उन्हें भुवनेश्वर के डीएवी स्कूल में दाख़िला मिल गया. यहाँ उनकी मुलाक़ात आनंद चंद्र दास से हुई जो फ़िज़िकल ट्रेनिंग इंस्ट्रक्टर हैं. कई सालों के अंतराल के बाद आनंद चंद्र दास के रूप में बुधिया को मिले एक नए प्रशिक्षक.
नए कोच कर रहे बहुत मेहनत
प्रशिक्षण देने के दौरान हम उनसे मिलने पहुंचे. चर्चा के दौरान उनका कहना था, "बुधिया में बहुत संभावनाएं हैं. बहुत जोश है. इसको मैं रोज़ मैराथन रेस की तैयारी करवाता हूँ. सड़कों पर दौड़ने का अभ्यास कराता हूँ. 15-20 किलोमीटर तक लेकर जाता हूँ. फ़ील्ड ट्रेनिंग भी दे रहा हूँ ताकि उसके अंदर की क्षमता बाहर आये."
आनंद चंद्र दास उन्हें बड़ी चुनौतियों के लिए तैयार कर रहे हैं. बहुत दिनों तक अभ्यास से दूर रहने की वजह से बुधिया को अपने नए कोच के साथ काफी मेहनत करनी पड़ रही है.
बिरंचि को नहीं भूले हैं बुधिया
मगर अब उन्होंने वैसा ही कुछ बड़ा करने की ठानी है जैसा उन्होंने चार साल की उम्र में किया था. वो तैयारी में जुट गए हैं. उन्होंने कहा, "अभी कोई मैराथन के लिए बुलाएगा तो मैं चला जाऊँगा. चूँकि कोई मौक़ा नहीं मिल रहा है इसलिए अभी छोटी रेस में हिस्सा ले रहा हूँ. मां को 8 हज़ार रुपये तनख़्वाह मिलती है. मगर एक खिलाड़ी के ख़र्चे ज़्यादा हैं. पौष्टिक खाना, कपड़े और जूते मिलाकर एक खिलाड़ी पर कम से कम एक लाख रुपये का ख़र्च होता है." मगर इन तैयारियों के बीच भी बुधिया अपने पहले कोच बिरंचि दास को नहीं भुला पाते हैं.
"बुधिया अब बड़ा हो गया है"
प्रशिक्षण के दौरान मिले ब्रेक के क्रम में वो रह रह कर बिरंचि दास को याद करते हैं. वो कहते हैं, "मेरे पहले कोच बिरंचि दास को मैं मिस करता हूँ. आज मैं जो कुछ हूँ, उन्हीं की बदौलत हूँ. इतने बच्चों में से उन्होंने मुझे ही चुना. उनका सपना था कि इस बच्चे को मैं ओलंपिक तक ले जाऊँगा. मैं उनका सपना पूरा करूंगा."
आर्थिक तंगी और संसाधनों की कमी ने बुधिया का मनोबल तोड़ा ज़रूर था. लेकिन आज उन्होंने चुनौतियों के लिए कमर कस ली है. उनके आस पास के लोग अब कहने लगे हैं, "बुधिया अब बच्चा नहीं है. वो बड़ा हो गया है."