भारतीय क्रिकेट टीम श्रीलंका के ख़िलाफ़ नागपुर में दूसरे टेस्ट में अपनी पकड़ मजबूत कर रही है, लेकिन हैरानी की बात है कि भारत में क्रिकेट को कंट्रोल करने वाली बीसीसीआई का भविष्य क्या है, ये अब भी तय नहीं है.
ऊपर से इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल के अगले सीज़न की तैयारी चल रही है और इससे जुड़े विवाद कब तक सुलझ पाएंगे यह किसी को नहीं मालूम.
फ़िक्सिंग में शामिल क्रिकेटरों के नाम सुप्रीम कोर्ट में जमा एक बंद लिफ़ाफ़े में हैं, लेकिन इसका जिन्न अभी तक नहीं खुला है. और अगर कुछ नाम आईपीएल में फिर खेलते नज़र आए तो फिर क्या होगा.
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दरअसल, बीते हफ्ते बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष अनुराग ठाकुर ने यह कहकर यह मामला फिर से गरमा दिया है कि आईपीएल के साल 2013 के संस्करण में स्पॉट फिक्सिंग मामलों में शामिल 13 लोगों के नाम सबके सामने लाए जाएं.
यह वह लिफ़ाफ़ा है जिसे साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट में जमा कराया गया और इसमें स्पॉट फिक्सिंग में शामिल लोगों के नाम हैं.
इस लिफ़ाफ़े को सुप्रीम कोर्ट ने अभी खोला नहीं है. यानी जहां से मामले की शुरुआत हुई, मुद्दा वहीं अटका हुआ है.
लेकिन बीसीसीआई के ख़िलाफ़ जो मामले थे उन पर सुनवाई हुई और कार्रवाई भी.
अगस्त 2015 में भारत के पूर्व न्यायाधीश आरएम लोढ़ा की अगुवाई वाले पैनल पर यह फैसला छोड़ दिया गया कि वह उस लिफ़ाफ़े को खोलकर देखना चाहते हैं या नहीं जिसे न्यायाधीश मुद्गल कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपा था.
सवाल यह भी है कि जब अनुराग ठाकुर ख़ुद बीसीसीआई के अध्यक्ष थे जब उन्होंने इस मामले के क्यों नही उठाया.
जवाब में क्रिकेट समीक्षक विजय लोकपल्ली ने बीबीसी से ख़ास बातचीत में कहा कि ऐसा लगता है कि अनुराग ठाकुर ने जैसे अचानक एक बम छोड़ा है, लेकिन यह तो सुप्रीम कोर्ट को ही बेहतर मालूम है कि लिफ़ाफ़ा कब खुलना चाहिए कि उसमें बंद 13 लोगों के नाम कब सबके सामने लाने चाहिए या नहीं लाने चाहिए.
अनुराग ठाकुर को लगता है कि उनके ख़िलाफ़ अवमानना के केस को तो जिस तरीके से बहुत जल्दी निपटाया गया और दूसरे पदाधिकारियों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई हुई, स्पॉट फ़िक्सिंग मामले में इतनी तेज़ी क्यों नहीं दिखाई गई.
दिलचस्प ये है कि पहले सुप्रीम कोर्ट में ख़ुद बीसीसीआई ने कहा था कि क्रिकेट के हित में लिफ़ाफ़ा बंद ही रहना चाहिए.
इस पूरे मामले में क्रिकेट समीक्षक अयाज़ मेमन बीसीसीआई को ही ज़िम्मेदार मानते हैं.
मेमन कहते हैं, "पहले भी सभी ने साल 2000 में देखा कि जब मैच फिक्सिंग का मामला सामने आया तो बीसीसीआई ने यही कोशिश की थी कि उसे लाल कालीन के नीचे छुपा दे, किसी को पता ना चले. लेकिन इन बातों से मसला हल नहीं होता. उसके 10-12 साल बाद मैच फिक्सिंग की समस्या एक बार फिर शुरू हो गई."
अब अगर लिफ़ाफ़े में बड़े से बड़े नाम भी बंद है तो क्या फर्क पड़ता है. अगर क्रिकेट में वास्तव में सफाई करनी है तो उन नामों को जनता के सामने लाना चाहिए.
अब लाख टके का सवाल कि जब पाकिस्तान के मोहम्मद आसिफ़, मोहम्मद आमिर और सलमान बट्ट जैसे बड़े नाम वाले खिलाड़ियों को सज़ा हो सकती है तो लिफ़ाफ़े में बंद लोगों को क्यों नहीं. क्या मामला इतना टेढ़ा है.
विजय लोकपल्ली कहते हैं, "सलमान बट्ट ने ख़ुद स्वीकार किया था और यह मामला इंग्लैंड में हुआ था. वहॉ मैच फिक्सिंग जैसे केस के लिए क़ानून है, यहां तो कोई क़ानून ही नहीं है. इस लिफ़ाफ़े में बंद लोगों के ख़िलाफ़ क्या सबूत हैं."
उनके अनुसार, "और अगर सबूत के साथ लोगों के नाम लिफ़ाफ़े में बंद हैं तो फिर तो यह बहुत बड़ा मामला है क्योंकि अब तो इसे कोर्ट ही सुलझा सकता है."
वो कहते हैं, "हम ख़ुद भी सुनते थे कि ऐसा होता है लेकिन लिख नहीं पाते थे या बोल नहीं सकते थे क्योंकि सबूत नहीं था. अब यहां फिक्सिंग का सबूत तो पुलिस ने ही जोड़ा है क्योंकि उनके पास जांच का अपना एक विशेष तरीक़ा है."
उनके मुताबिक, "अच्छा होगा कि अब इस मामले की जांच सीबीआई या दूसरी जांच एजेंसी करे लेकिन यह सच है कि मामला पेचीदा है."
अब देखना है कि बंद लिफ़ाफ़े का जिन्न कब बाहर आता है और उसका क्या असर होता है.