World Disability Day: वो भारतीय पैरालंपियन जिन्होंने देश को किया गौरवान्वित

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World Disability Day: indian paralympians who make india proud

नई दिल्ली। आज पूरे देश और दुनिया में विश्व विकलांग दिवस मनाया जा रहा है। ये वो दिन है जिसे हम बड़े गर्व के साथ मनाते हैं। गर्व इसलिए क्योंकि भारत के दिव्यांगों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने देश का नाम रौशन किया है। कई लोग स्वस्थ होने के बावजूद वो मुकाम हासिल नहीं कर पाते जो दिव्यांग जन अपनी इच्छाशक्ति से हासिल कर लेते हैं। उदाहरण के पैरालंपिक को ही ले लीजिए जहां आपको जिंदगी की सबसे बड़ी प्रेरणा देखने को मिल सकती है। भारत के देवेंद्र झाझड़िया हों या महिला एथलीट दीपा कुमार सभी ने भारत को गर्व करने के कई मौके दिए हैं। बता दें कि अन्तर्राष्ट्रीय दिव्यांग दिवस अथवा अन्तर्राष्ट्रीय विकलांग दिवस हर साल 3 दिसंबर को मनाया जाता है। वर्ष 1976 में संयुक्त राष्ट्र आम सभा के द्वारा "विकलांगजनों के अंतरराष्ट्रीय वर्ष" के रुप में वर्ष 1981 को घोषित किया गया था।

देवेंद्र झाझरिया

देवेंद्र झाझरिया

देवेन्द्र झाझरिया भारतीय पैरालंपिक खिलाड़ी है। उनका एक हाथ आधा कटा हुआ है। देवेंद्र पैरालंपिक में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय पैरालिंपियन है। 2004 पैरालंपिक एथेंस में उन्होंने पहला स्वर्ण पदक जीता था रियो डी जनेरियो, 2016 ग्रीष्मकालीन पैरालंपिक खेल में, उन्होंने अपने पहले रिकॉर्ड को बेहतर बनाते हुए, एक ही आयोजन में दूसरा स्वर्ण पदक जीता।

गिरीश शर्मा

गिरीश शर्मा

गिरीश एक अनुभवी बैडमिंटन प्लेयर हैं और इनका एक पैर नहीं है। आप सोच रहे होंगे कि दो पैरों से बैडमिंटन खेलने में जान निकल जाती है, एक पैर से कैसे खेला जा सकता है। यही तो बात है गिरीश की जो इन्हें इतनी बड़ी प्रेरणा बनाती है। बचपन में एक ट्रेन दुर्घटना में गिरीश का पैर कट गया था लेकिन फिर भी बैडमिंटन के प्रति उनका जुनून कम नहीं हुआ। उनका दूसरा पैर इतना मज़बूत है कि वो बिना किसी कठिनाई के बैडमिंटन खेल लेते हैं। ऐसे इंसान पर गर्व नहीं होगा तो किस पर होगा।

मरियप्पन थंगवेलू

मरियप्पन थंगवेलू

रियो पैरालंपिक खेलों के दूसरे ही दिन भारत के लिए पुरुषों के हाई जंप टी42 फाइनल्स में मरियप्पन थंगवेलू ने देशवासियों की उम्मीदों पर खरा उतरते हुए स्वर्ण पदक दिलाया था। जबकि इसी क्रम में वरुण सिंह भाटी ने कांस्य पदक हासिल किया था। मरियप्पन की इस बड़ी उपलब्धि के लिए खुद पीएम मोदी ने सराहा था। थंगावेलु पैरालंपिक में ऊंची कूद में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय बने थे। हालांकि, इस स्पर्धा में पहला पदक 2012 में एचएन गिरीशा ने जीता था। मरियप्पन थंगावेलु गरीबी और शारीरिक अक्षमता से लड़ते हुए इस मुकाम तक पहुंचे हैं। वे पांच साल के थे जब एक सड़क हादसे में उनका पैर खराब हो गया था। उनकी मां आज भी सब्जियां बेचती हैं जिससे उनके परिवार का गुजारा होता है।

दीपा मलिक

दीपा मलिक

दीपा ने साल 2016 पैरालंपिक के शॉटपुट इवेंट में देश के लिए सिल्वर मेडल जीतकर कामयाबी की एक नई परिभाषा लिखी थी। वो पैरालंपिक में मेडल जीतने वाली पहली भारतीय महिला हैं। शॉटपुट में दीपा मलिक ने छठे प्रयास में 4.61 का स्कोर बनाकर सिल्वर मेडल जीता था। 30 सितंबर 1970 को सोनीपत, हरियाणा में जन्मीं, दीपा मलिक को मात्र 30 साल की उम्र में लकवा मार गया और जिससे उनके कमर के नीचे का पूरा हिस्सा पैरेलाइज्ड हो गया था, उनकी तीन बार सर्जरी हुई लेकिन इसके बाद भी वो चल नहीं सकतीं हैं।

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    Story first published: Sunday, December 3, 2017, 13:36 [IST]
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