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अचूक निशाना साधने वाले तीरंदाज लिंबा राम को हुई गंभीर बीमारी ने जवानी में कर दिया बूढ़ा

नई दिल्ली। अच्छे से बुरे समय की खबर किसी को नहीं। जब कोई इंसान दुनियाभर में पहचान बनाकर और कई बड़ी उपलब्धियां हासिल कर अचानक खुद की जिंदगी से लड़ने में जूझने लग पड़े तो उसका आत्मविश्वास डगमगाने लग पड़ता है। भारत के तीरंदाज लिंबा राम की कहानी भी अब ऐसी ही बनती जा रही है। तीरंदाजी की नींव रखने वाले यह महान खिलाड़ी आज जिंदगी के उस दाैर से गुजर रहे हैं जहां उन्हें अपनी स्थिति सुधारने के लिए सरकार से मदद लेनी पड़ रही है। दरअसल, अचूक निशाना साधने वाले लिंबा राम के आज हाथ कांप रहे हैं। डाॅक्टरों का कहना है कि उन्हें पार्किसन रोग हो सकता है। इस रोग के कारण 47 साल के लिंबा राम बूढ़े होते जा रहे हैं।

क्या है पार्किंसन रोग

क्या है पार्किंसन रोग

पार्किंसन रोग केन्द्रीय तंत्रिका तंत्र का एक रोग है जिसमें रोगी के शरीर के अंग कंपन करते रहते हैं। यह रोग धीरे-धीरे अपने लक्षण दिखाता है, पता भी नहीं पड़ता कि कब लक्षण शुरू हुए। अनेक सप्ताहों व महीनों के बाद जब लक्षणों की तीव्रता बढ़ जाती है तब अहसास होता है कि कुछ गड़बड़ है। बहुत सारे मरीजों में पार्किन्‍सोनिज्‍म रोग की शुरूआत कम्पन से होती है। पार्किंसन किसी को तब होता है जब रसायन पैदा करने वाली मस्तिष्क की कोशिकाएँ गायब होने लगती हैं। हाथ की एक कलाई या अधिक अंगुलियों का, हाथ की कलाई का, बांह का। पहले कम रहता है। यदाकदा होता है। रुक रुक कर होता है। बाद में अधिक देर तक रहने लगता है व अन्य अंगों को भी प्रभावित करता है। आराम की अवस्था में जब हाथ टेबल पर या घुटने पर, जमीन या कुर्सी पर टिका हुआ हो तब यह कम्पन दिखाई पडता है।

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छोटे से गांव से उभरे थे बड़े सितारा बनाकर

छोटे से गांव से उभरे थे बड़े सितारा बनाकर

जहां देश के कई खिलाड़ी किसी बड़े इलाकों से निलकते हैं तो वहीं लिंबा राम थे जो एक छोटे से गांव से उभकर बड़ा सितारा बनकर सामने आए। लिंबा राम का जन्म जस्थान के उदयपुर जिले की झाड़ोल तहसील के सारादीत गांव में 30 जनवरी 1972 में हुआ था। वह आदिवासी भील परिवार की संतान हैं। राजस्थान का यह इलाका आदिवासी आबादी का इलाका है और आज भी यहां के कई गांव विकास की मुख्यधारा से दूर हैं। जब लिंबा राम करीब 15 साल के थे, तो वर्ष 1987 में एक दिन उनके चाचा खबर लाए कि सरकार इस इलाके के अच्छे तीरंदाजों का चयन करने के लिए पास के गांव में एक कैंप में लगा रही है। कई लड़के उस कैंप में पहुंचे और लिंबा राम सहित तीन लोगों का चयन हुआ। इनमे एक श्याम लाल भी थे, जिन्हें बाद में अर्जुन अवार्ड मिला। खेल विकास प्राधिकरण इन तीनों को दिल्ली ले आई और यहां आरएस सोढ़ी ने इन्हें प्रशिक्षण देना शुरू किया।

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क्या कहना है डाक्टरों का

क्या कहना है डाक्टरों का

लिंबा राम का इलाज इस समय दिल्ली के एम्स असप्ताल में चल रहा है। उनकी आर्थिक सहायता के लिए खेल मंत्रालय ने आगे हाथ बढ़ाया है। खेल मंत्रालय ने 5 लाख रूपए उन्हें इलाज के लिए दिए हैं। इस महान तीरंदाज खिलाड़ी की बीमारी को लेकर डॉक्टरों का कहना है कि उनको गंभीर बीमारी है लेकिन उसे दवा के जरिए कंट्रोल में रखा जा सकता है। लिंबा की पत्नी मेरियन जेनी ने कहा कि डॉक्टर ने बताया है कि उनकी बीमारी ठीक नहीं हो सकती लेकिन उसे कंट्रोल किया जा सकता है। मेरे पति को केवल अच्छे इलाज की जरूरत है। हमें इलाज जारी रखने के लिए आर्थिक सहयोग भी चाहिए। निजी अस्पतालों में इलाज काफी महंगा है, इसलिए हम उन्हें यहां लेकर आए थे।

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पद्म श्री अवाॅर्ड से हैं सम्मानित

पद्म श्री अवाॅर्ड से हैं सम्मानित

राष्ट्रीय स्तर पर अपनी योग्यता साबित करने के पश्चात् लिम्बाराम ने अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी काबिलियत सिद्ध की । उन्होंने 1992 के बीजिंग एशियाई खेलों में 30 मीटर वर्ग में विश्व रिकॉर्ड बना डाला और स्वर्ण पदक जीत लिया । लिम्बाराम के कई वर्षों तक खाली रहने के पश्चात् पंजाब नेशनल बैंक में खेल अफसर के रूप में नियुक्ति हुई । उन्हें 1991 में ‘अर्जुन पुरस्कार' प्रदान किया गया। इसके बाद 2012 में उन्हें पद्म श्री अवाॅर्ड से सम्मानित किया गया था।

Story first published: Wednesday, May 8, 2019, 16:31 [IST]
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